*मिल गया अलादीन का चिराग, 50 अरब का काम 90 करोड़ में, 700 सालों तक चकाचक रहेगा भारत*
*अमेरिका और यूरोप के पास पुराने रिएक्टरों की फौज तो है लेकिन उनकी तकनीक खर्च करने वाली है, पैदा करने वाली नहीं.*
* भारत का PFBR रूस के बाद दुनिया का दूसरा ऐसा रिएक्टर है जो अपनी खपत से ज्यादा ईंधन पैदा करेगा.
*तकनीक के मामले में भारत ने फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों को पीछे छोड़ते हुए उस सेकंड स्टेज को पार कर लिया है जहां पहुंचना कई देशों का केवल सपना है.*
◆ भारत ने फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर टेक्नोलॉजी हासिल कर ली है.
◆ इस तकनीक में फ्यूल के रूप में थोरियम का इस्तेमाल होता है.
◆ भारत के पास मौजूद करीब 2.25 लाख टन थोरियम का भंडार ऊर्जा का वह कुबेर खजाना है जो देश को अगले 300 से 400 सालों तक बिना किसी बाधा के बिजली देने की गारंटी देता है.
◆ इस तकनीक को हासिल करने के लिए यूरोप और अमेरिका ने काफी पैसे खर्च किए थे लेकिन सब विफल रहे. करीब 50 अरब डॉलर की रकम खर्च करने के बाद सभी देश इस प्रयोग से बाहर हो गए.
◆ अब भारत की यह सफलता इसके भविष्य को लेकर काफी अहम हो गया है.
◆ कल्पक्कम में भारत ने इस टेक्नोलॉजी को हासिल करने की आधिकारिक घोषणा कर दी.
◆ फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर एक बेहद जटिल टेक्नोलॉजी है.
◆ पश्चिमी देश इस तकनीक को हासिल करने में नाकाम रहे हैं.
◆ इस तकनीक वाले न्यूक्लियर रिएक्टर में यूरेनियम की जगह थोरियम का इस्तेमाल किया जाता है. और दुनिया के थोरियम भंडार का 25 फीसदी हिस्सा भारत में है.
◆ यानी इस तकनीक की बदौलत परमाणु बिजली के क्षेत्र में भारत की यूरेनियम पर निर्भरता खत्म हो जाएगी.
◆ भारत में यूरेनियम भंडार बहुत नगण्य है. इसके लिए भारत को रूस और ऑस्ट्रेलिया पर निर्भर रहना पड़ता है.
◆ भारत ने फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर की कल्पना 70 साल पहले की थी. जानेमाने वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा ने इस दिशा में काम शुरू किया था. तब से भारत इस तकनीक को हासिल करने में लगा था.
◆ दरअसल, दुनिया के सबसे अमीर छह देशों ने फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर्स तकनीक हासिल करने पर 50 बिलियन डॉलर (लगभग 4.25 लाख करोड़ रुपये) खर्च कर चुके हैं. लेकिन, असफलता के कारण एक-एक करके सभी ने प्रोजेक्ट छोड़ दिए.
◆ इस तकनीक को विकसित करने के लिए अमेरिका ने 15 बिलियन, जापान ने 12 बिलियन, ब्रिटेन ने 8 बिलियन, जर्मनी ने 6 बिलियन डॉलर खर्च कर दिए. फ्रांस और इटली भी भाग खड़े हुए. सबने कहा कि यह तकनीक हासिल करना बहुत मुश्किल और बहुत महंगा है.
◆ पीएम मोदी ने वर्ष 2024 में इस प्रोजेक्ट की निरीक्षण किया था.
◆ लेकिन, भारत ने सिर्फ 90 करोड़ डॉलर (लगभग 7,700 करोड़ रुपये) में अपना पहला कमर्शियली वायबल प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विकसित कर लिया. ऐसा करने वाला भारत, रूस और चीन के बाद तीसरा देश है.
◆ वर्ष 2004 में यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ प्रोजेक्ट था. शुरुआती बजट 42 करोड़ डॉलर का था. अब 22 साल बाद दर्जनों बार डेडलाइन खत्म होने और लागत दोगुनी होने के बाद भारत के हाथ सफलता लगी.
◆ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे सिविल न्यूक्लियर के सफर में एक अहम कदम बताया है.
*भारत क्यों नहीं छोड़ा ये प्रोजेक्ट? कारण बहुत सीधा है. भारत के पास दुनिया के यूरेनियम रिजर्व का सिर्फ 1-2 फीसदी भंडार है. ऐसे में 1.4 अरब लोगों वाले देश के लिए पारंपरिक न्यूक्लियर फ्यूल पर निर्भर रहना खुदकुशी करने जैसा है. दूसरी तरफ भारत के पास दुनिया के थोरियम रिजर्व का 25 फीसदी हिस्सा है. पृथ्वी पर किसी भी एक देश के पास इतना बड़ा भंडार नहीं है. परमाणु ऊर्जा विभाग के अनुसार, भारत में करीब एक करोड़ टन मोनाजाइट है, जिसमें 9,63,000 टन थोरियम ऑक्साइड भरा हुआ है. समस्या यह है कि थोरियम को यूरेनियम की तरह सीधे नहीं जलाया जा सकता. 1950 के दशक में डॉ. होमी भाभा ने इसी समस्या का हल निकाला. उन्होंने तीन चरणों वाला न्यूक्लियर प्रोग्राम बनाया.*
vst News LIVE हिंदी के सर्वश्रेष्ठ ऑनलाइन समाचार पोर्टल में से एक है। दैनिक अद्यतन ई-पेपर के लिए, हमारे ई-पेपर अनुभाग पर जाएँ।
VstNews.in . All Rights Reserved. Design by Business Innovation